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🚩गर्भाधान संस्कार भाग-3🚩
सोलह संस्कारो में प्रथम संस्कार गर्भाधान संस्कार है,हम आज इसका तीसरा भाग देखेंगे।
संस्कार शरीर पर कैसे परिणाम करते हैं यह हमने पिछली (गर्भाधान संस्कार भाग – २)पोस्ट में पढा है। @संस्कार का विज्ञान
विवाहसंस्कार के बाद गर्भाधान संस्कार यज्ञ करने का अत्याधिक महत्व है। भारतीय परिवारों में यह संस्कार करने की प्रथा पूर्णतः बंद हो चूकी है। वर्तमान परिस्थिति यह उसका बहुत बड़ा प्रमाण है। पीढी दर पीढी आधुनिकता के चलते माता-पिता में ही इन संस्कारों का अध:पतन होता आया है, फिर संतान का जन्म किन संस्कारों से होगा यह हम समझ सकते हैं। इसके लिए माता-पिता को ही आधुनिकता को कितना अपनाना है इसपर विचार करना चाहिए। उसके दुष्परिणाम की हद को कई परिवारों की दु: व्यवस्था देखकर खुद को नियंत्रित करना जरूरी है। उसके लिए आध्यात्म का सहारा लेना होगा। पैसे के पीछे कितनी हद तक भागना है, यह हमे निसर्ग से सीखना होगा। यह सृष्टि यूं ही नहीं हमें अपने आप सुबह जगाती हैं और रात को सुलाती है।
‘जितनी जीवन में सुबह है उतनी ही राते भी है। जितना सुख है उतना ही दु:ख भी है।’
इसलिए सिर्फ सुख के पीछे भागने के लिये जीने से अच्छा परिवार में संस्कार को महत्व देंगे तो जीवन दु:ख में भी समाधानी रहेगा ।
राष्ट्र निर्माण संस्कारों से ही संभव होगा।
गर्भाधान संस्कार के लिए ऋतुदान शब्द का प्रयोग विशेष रुप से किया जाता है। इस शब्द का अभिप्राय समझे बिना यह सब व्याख्या अधूरी ही रह जाती है। साधारणतः प्रजनन की क्षमता स्री में मासिक धर्म के चौथे दिन से शुरू हो जाती है। ऋतुकाल के १६ दिनों में से पहले चार दिन वर्जित है। उत्तम संतान की प्राप्ति के लिए गर्भ का पुष्ट होना जरूरी है। साथ ही संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले माता-पिता के विचार भी संस्कारीत होना चाहिए। गर्भधारण कर दम्पत्ति जैसी संतान चाहते हैं, स्त्री को चाहिए की अपने आपको वैसे वातावरण में रखें। उदाहरणार्थ शूरवीर बनाने के लिए वीरों की कथाएं सुने,पढ़ें और वीरों के चित्र देखें तथा हर समय वीरों के जीवन का चिंतन करें।
वैदिक संस्कृति में इस संस्कार को अत्यंत धार्मिक महत्ता प्रदान की गई है। यह इस संसार में नई आत्मा के प्रवेश का एकमात्र मार्ग है। मानव के नवनिर्माण के लिए वैदिक महापुरुषों ने सर्वप्रथम इसी संस्कार पर अपना ध्यान केंद्रित किया, क्योंकि इसी संस्कार से पवित्र होने पर ही उत्तम आत्माओं का इस संसार में आगमन होता है। गर्भाधान संस्कार जैसा पवित्र यज्ञ समग्र विश्व के लिए होता है, इसे ऋषियों ने एक सामाजिक कर्तव्य माना है। यही कारण है कि बीजारोपण के समय ही उत्तम संतान की कामना के लिए किये गये इस यज्ञ का स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन पर प्रभाव होता है। तभी तो चरक जैसे आयुर्वेदाचार्य ने कहा है कि जैसी संतान की इच्छा हो ,गर्भस्थ स्त्री गर्भकाल में वैसे विचार, वातावरण, व्यवहार व कथा प्रसंग में रत रहे।
यह तो सर्वविदित है कि अभिमन्यु ने गर्भावस्था में ही चक्रव्यूह भेदन की कला जान ली थी। हम वर्तमान में भी ऐसे महान बालक देखते हैं जो विलक्षण प्रतिभा वाले हैं क्योंकि उनकी माताओ ने गर्भावस्था मे खुद को वैसे वातावरण में रखा है।
इन सभी दृष्टांतों से यह बात स्पष्ट है कि गर्भाधान संस्कार धार्मिक होने के साथ ही सृष्टि की अभिवृद्धि का कारण भी है। यदि गर्भाधान संस्कार को पूर्ण वैदिक रीति से किया जाए तथा जैसी संतान की कामना है गर्भस्थ स्त्री अपने आप को उसी वातावरण में रखे और घर में भी उन्ही विचारों पर चर्चा हो,घर में क्लेश ना हो तो निश्चित ही कामधेनु के समान इच्छित संतान पैदा होगी।
जिससे परिवार, माता-पिता व संतान का नाम सर्वत्र गौरव के साथ लिया जाएगा। संसार में सुख समृद्धि होगी।
जयतु सनातन 🚩
जय हिन्द 🚩🚩
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🚩चलो … सूर्योदय हो रहा है..💥
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अगली पोस्ट …. गर्भाधान संस्कार (भाग ४) में पुत्र-रत्न या पुत्री -रत्न की प्राप्ति के विषय में।
