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🚩 शिव संकल्प सूक्त (४)🚩

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संकल्प के द्वारा हमारे मन को नियंत्रित किया जा सकता है।
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ॐ येनेदं भूतो भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम्।
येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु॥४॥🚩
अर्थात:
जिस मन में भूत, भविष्य एवं तीनों कालों का प्रत्यक्षीकरण होता है, जिसके द्वारा सप्तहोता यज्ञ का विस्तार करते हैं। यज्ञों का विस्तार शुद्ध एवं पापरहित मन वाले ही कर सकते हैं।
ऐसा मेरा मन शुभ एवं कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो।
विवेचन:
मन का स्वभाव चंचल है, वह भूतकाल, भविष्यकाल और वर्तमान काल में कही भी जा सकता है। यह मन हमारा मित्र या शत्रु भी बन सकता है।अगर मन को वश में किया गया तो वह मित्र बना रहेगा अन्यथा वह शत्रु ही कहलाएगा।
गीता के छठवें अध्याय का छठवां श्लोक यही बात स्पष्ट करता है।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जित:।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥६.६॥
अर्थात: जिसने मन को जीत लिया है उसके लिए मन सर्वश्रेष्ठ मित्र है, किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया उसके लिए मन सबसे बड़ा शत्रु बना रहता है।
यह मन अगर शुद्ध है तो सप्तहोता याने मानव शरीर द्वारा आंतरिक इंद्रिय यज्ञ सृष्टि में सकारात्मक विस्तार (पुरोहित) करतें हैं। पापरहित और शुद्ध मन वाले व्यक्ति ही मन की शक्ति से इंद्रिय यज्ञों को विस्तारीत करते हैं।
जीवन में सफलता और असफलता मन की अवस्था पर ही निर्भर है। इसलिए मन को वश में करना जरूरी है। वरना आंतरिक शत्रु ही जीवन में लक्ष्य और सफलता से व्यक्ति को दूर करता है।
इसलिए कहा गया है कि मन स्थिर नहीं है तो अच्छे गुरु का सहारा लेकर शास्त्रों का अध्ययन करें जो हमें सही मार्ग दिखाते हैं।
इसमें सबसे महत्वपूर्ण अंग अष्टांगयोग का अभ्यास है। जिससे व्यक्ति अपने मन को वश में करके शुद्ध लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है।
शुद्ध मन से किया गया संकल्प यह शुभ संकल्प होता है।
तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु
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