Blogs
🚩 शिवसंकल्पसुक्त (५)🚩
🚩 शिवसंकल्पसुक्त (५)🚩
जीवन में वेदों को किस तरह स्थापित करें जिससे यह मन शिव संकल्प युक्त हो जाए…🚩
ॐ यस्मिन्नृच: साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवारा:।
यस्मिंश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु ॥५॥
अर्थात:
जिस मन में वैदिक ऋचाएं, सामवेद और यजुर्वेद के मंत्र इस प्रकार प्रतिष्ठित है, जैसे रथ के पहिए में ‘अरे’ लगे होते हैं तथा जिस मन में प्रजा के हित का सकल ज्ञान समाहित है,ऐसा शक्तिशाली मेरा मन शुभ एवं कल्याणकारी संकल्पो से युक्त हो।
वेदों का मानव जीवन में कितना अधिक महत्व है इसको दर्शित करती एक ऋचा ….
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।
स्वं स्वं चरीत्रं शिक्षरेन् पृथिव्यां सर्वमानवा:॥मनु-२.२०॥
संपूर्ण मानव जीवन इन वेदों से सर्वतोभावेन सम्बद्ध ओत-प्रोत परिव्याप्त है, कुछ भी वेदबाह्य नहीं है। यही वेद पुरूषार्थ -सम्पादक परम महौषधि हैं। इनमें एक-एक दिन का खण्ड-खण्ड करके नहीं,अपितु मानव जीवन की समग्रता सम्पूर्णता पर चिन्तन किया गया है। ये वेद मानव जीवन के लिए सुखपरिपूर्ण परम आह्लादमयी एक सुव्यवस्थित समन्वित परिपूर्ण जीवन-पद्धति का प्रतिपादन करते हैं। इस लोक में केवल वर्तमान कालीन सुख ही काम्य नहीं है, अपितु भावी जन्म में जीवन और भी अधिक आह्लादमय होवे, यही अभीष्ट है। इस तरह ये वेद अभय होने का ,अमृतत्व -प्राप्ति का संविधान प्रस्तुत करते हैं, क्योंकि हम तो मूलतः अमृत पुत्र है–
ॐ वयम् अमृतस्य पुत्रा:। ऋ १०.१४.१
वेदों के इस ज्ञान को रथ के पहिये में स्थित ‘अरे’ की तरह जीवन में स्थापित कर लिया जाए तो यह मन शुभ संकल्प से युक्त हो जाएगा।
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
🚩 तन्मे मन:शिवसंकल्पमस्तु🚩
Visit: www.vedanandam.com
वैदिक गुरुकुलों का एकमेव संगठन 🚩
